Friday, August 7, 2026
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सरकारी एम्बुलेंसों पर सवाल: कागज अधूरे थे तो सड़कों पर कैसे दौड़ते रहे वाहन….

बिलासपुर। स्वास्थ्य विभाग के अधीन संचालित शासकीय एम्बुलेंसों की व्यवस्था को लेकर अब एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2022 में जिले के बिल्हा, तखतपुर, कोटा और मस्तूरी क्षेत्र के लिए उपलब्ध कराए गए चार एम्बुलेंस वाहनों के दस्तावेजों और पंजीयन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने की बात सामने आई है।

मामले को लेकर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शुभा गरेवाल के कथित बयान का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या संबंधित वाहनों का परिवहन विभाग में पंजीयन पूरा होने से पहले ही उनका उपयोग शुरू कर दिया गया था। खासतौर पर तखतपुर क्षेत्र के लिए उपलब्ध कराई गई एक एम्बुलेंस के संबंध में दावा है कि उसे जिला कार्यालय में रखा गया और रायपुर से चिकित्सा सामग्री लाने जैसे कार्यों में भी इस्तेमाल किया गया।

एम्बुलेंस थी तो दस्तावेज कहां थे?

सरकारी वाहन होने के बावजूद यदि किसी एम्बुलेंस का पंजीयन, नंबर अथवा आवश्यक कागजात उपलब्ध नहीं थे, तो उसके सार्वजनिक सड़कों पर इस्तेमाल की अनुमति किस आधार पर दी गई—यह इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल है। वाहन के संचालन के दौरान उसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी या कर्मचारी के पास थी, इसकी जानकारी भी जांच का हिस्सा बन सकती है।

रिकॉर्ड खंगाले जाएं तो खुल सकती है पूरी तस्वीर

मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए केवल मौखिक बयानों के बजाय विभागीय रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी। एम्बुलेंस आवंटन आदेश, वाहन खरीद संबंधी दस्तावेज, परिवहन विभाग का पंजीयन रिकॉर्ड, लॉगबुक, ईंधन उपयोग का विवरण और वाहन संचालन से जुड़े आदेशों की जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि वाहन कब विभाग को मिले और कब से उनका सड़क पर उपयोग शुरू हुआ।

नियमों के पालन पर भी उठे सवाल

मोटर वाहन अधिनियम के तहत सार्वजनिक मार्ग पर वाहन चलाने के लिए वैध पंजीयन आवश्यक है। ऐसे में यदि जांच में बिना पंजीयन वाहन संचालन की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारी तय करने का प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

फिलहाल पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि विभागीय स्तर पर दस्तावेजों की स्थिति क्या थी और यदि कोई कमी थी तो उसे दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला महज दस्तावेजी लापरवाही का था या सरकारी वाहनों के संचालन में गंभीर नियमों की अनदेखी हुई।

अब उठ रहे हैं ये सवाल

चारों एम्बुलेंस का पंजीयन कब और किसके नाम से हुआ?

वाहन नंबर जारी होने से पहले क्या उनका संचालन किया गया?

संबंधित वाहनों की लॉगबुक में क्या दर्ज है?

बिना दस्तावेज वाहन चलाने की अनुमति किस स्तर से मिली?

जिम्मेदारी तय करने के लिए विभाग ने अब तक क्या कार्रवाई की?

क्या पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?

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